Saturday, 8 July 2017

Kuch Yaade !

देखते देखते ये ज़िन्दगी सितम हो गयी ,
हम मुस्कुराते रहे और आंखे नम हो गयी।

तन्हाई मेरे दिल में समाती चली गयी ,
ज़िन्दगी एक रेल है , हॉर्न बजाते चली गयी ,
यादे वापस से आयी और हमें रुलाते चली गयी। 

न जाने किस बात का दर्द बढ़ता चला गया ,
उम्मीदों का सावन , ठण्ड में ढलता चला गया। 

अब तो बीते पलो का ख्याल जाता नहीं है ,
यादो को टटोलने के सिवाए कुछ आता नहीं है। 
ज़ी चाहता है की बीते लम्हे याद न करू ,
 पर वो बीता लम्हा वापस आता नहीं है।

मैं अक्सर भूल जाता हूँ , पर यादे भुला न पाया ,
मैं सब से जीत जाता हूँ पर तुम्हे हरा न पाया।

तुम्हारी यादो ने हमको ऐसा सताया, 
उनमे डूब कर मैं तह तक न आ पाया। 

अब तो ज़ी चाहता है की अपने आप से कुछ बात हो ,
चारो तरफ अँधेरा हो और काली-काली रात हो। 
खो गया हु मैं ,मेरी किसी से मुलाकात हो ,
मैं अगर मंज़िल से मिलु तो उसका कारण मैं नहीं, कायनात हो।   

क्या करू ,आजकल दुनिया को देखने का नजरिया बदल गया ,
हकीकत के सफर में , मेरा ईमान बदल गया  
अब मित्र के नाम पे हैवान नजर आता है ,
ये सफर एक कोहराम नजर आता है। 

चलो इसी बहाने दिल में तन्हाई दबाना सीख लिया,
हस के दर्द छिपाना सीख लिया ,
क्या करे ज़िन्दगी इसी का नाम है ,
मन को बहलाना और मुस्कुराना सीख लिया। 


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